इतिहास को जानने के साधन साधनों की विवेचना कीजिये


इतिहास को जानने के साधन साधनों की विवेचना कीजिये

4. मूर्तियाँ (Idols)- 

पुरातात्त्विक साधनों से सम्बन्धित एक अन्य साधन मूर्तियाँ हैं जो प्राचीन भारतीय इतिहास की रचना में अनेक प्रकार से सहायक हैं।
(i) हड़प्पा संस्कृति से सम्बन्धित मूर्तियाँ हमें मूर्तिकला, नृत्यकला आदि की जानकारी देती हैं।
(i) कुषाण, गुप्त तथा गुप्तोत्तर कालीन जनसाधारण एवं देवी-देवताओं की प्रतिमाएं न केवल तत्कालीन लोगों की धार्मिक आस्थाओं की जानकारी देती हैं बल्कि उनसे हमें सर्वसाधारण द्वारा प्रयोग की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं (शंख, विभिन्न पुष्प, हथियार आदि) की जानकारी भी देती हैं। भारहुत, बोध गया, साँची और अमरावती की। मूर्तिकला में जनसाधारण के जीवन की जीती-जागती झाँकी मिलती है।
(iii) मूर्तियों को देखकर काल विशेष की मूर्तिशैली की जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए प्रारम्भिक कुषाण काल में विदेशी या यूनानी शैली का प्रभाव अधिक है। कालान्तर में मथुरा शैली में भी मूर्तियाँ बनाई गयीं।
(iv) गुप्तकाल की मूर्तिकला में अन्तरात्मा और मुखाकृति में जो सामंजस्य है वह अन्य किसी काल की मूर्तिकला में नहीं प्राप्त होता ।
(v) गुप्तोत्तर काल की प्रतिमाओं में सांकेतिकता अधिक मिलती है जो जनसाधारण की समझ में प्रायः नहीं आ सकती और केवल कला में निपुण व्यक्ति ही इन्हें समझ सकते हैं। (vi) विदेशों में प्राप्त मूर्तियाँ भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रचार को अभिव्यक्त करती है।

5. चित्रकला (Paintings)-

मूर्तिकला की भाँति चित्रकला भी प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में सहायक हैं। निःसन्देह ऐसे चित्र हमें बहुत कम मिलते हैं जो भारतीय इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।
(i) लेकिन जहाँ-जहाँ चित्र मिलते हैं वे स्थान विशेष की वेशभूषा, अनेक रीति-रिवाजों की झाँकी प्रस्तुत करते हैं।
| (ii) अजन्ता के चित्रों में मनोभावों की बड़ी सुन्दर ढंग से अभिव्यक्ति की गयी है। चित्रकार ने माता और शिशु' अथवा 'मृत्यु के नजदीक राजकुमारी' जैसे चित्रों में ऐसे मनोभावों को चित्रित किया है जो शाश्वत है और किसी देश अथवा काल विशेष की बपौती नहीं है।
(iii) अजन्ता की गुफाओं में बनाये चित्रों से यह जानकारी मिलती है कि गुप्तकाल में कला ने कितनी ज्यादा प्रगति कर ली थी। आज भी इन चित्रों के रंगों को ज्यों का त्यों देखकर दर्शकगण आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इनकी प्रशंसा में कला पारखी ग्रिफिथ (Grifithe) ने लिखा है, "करुणा तथा भावनाओं की दृष्टि से, भावनाओं की अभिव्यक्ति की नजर से कला के इतिहास में ये चित्र अद्वितीय हैं।” वे आगे कहते हैं “फ्लोरेन्स का कलाकार अधिक अच्छी रूपरेखा बना सकता है। वेनिस का कलाकार अधिक अच्छे रंग भर सकता है, किन्तु उनमें से एक भी अजन्ता के चित्रों की भाँति भाव प्रदर्शित नहीं कर सकता।”

6. अवशेष (Remains) अथवा उत्खनन (Excavation) से प्राप्त सामग्री 

प्राचीन भारत के निवासियों ने अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़े हैं। यद्यपि इनमें से कुछ स्मारकों एवं भवनों के खण्डहरों के रूप में हमें प्राप्त हुए हैं। लेकिन इनके अधिकांश अवशेष सारे देश में बिखरे हुए अनेकानेक टीलों के नीचे दबे हुए हैं। इनमें से, जिन थोड़े से टीलों का उत्खनन हुआ है उन्हीं ने हमें प्राचीन काल के जन-जीवन के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है।
(i) जमीन से प्राप्त अवशेषों अथवा उत्खननों से प्राप्त सामग्री से प्रागैतिहासिक और आद्य इतिहास पर बहुत प्रकाश पड़ा है। उदाहरणार्थ आदि मानव ने किस प्रकार उपलब्ध प्राकृतिक साधनों का उपयोग करके अपने जीवन को सुखमय बनाने का प्रयत्न किया, इसकी जानकारी पुरापाषाण मध्यपाषाण तथा नवपाषाण कालों की हड़ियों से प्राप्त पाषाण हड़ी, सींगों के भद्दे खुरदरे, छोटे-छोटे तथा कालान्तर में बने सुडौल औजारों तथा हथियारों से मिलती है। पाकिस्तान में सोहन नदी की घाटी में पुरापाषाण काल के प्राप्त हुए पत्थर के भद्दे तथा खुरदरे औजारों से विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि भारत में
आदि मानव आज से करीब 4 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व के मध्य रहता था। सोहन नदी जैसे औजार दक्षिण भारत में भी प्राप्त हुए हैं। पुरापाषाण युग के औजार छोटा-नागपुर के पठार में मिले हैं।
(ii) नवपाषाण काल से सम्बन्धित मिट्टी के बर्तनों तथा उपकरणों से पता चलता है कि ईसा से करीब 10 हजार से 6 हजार वर्ष पूर्व के काल में भारतीय मानव के जीवन में बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। अब उसने बस्तियाँ स्थापित करनी शुरू कर दीं तथा वह कृषि करने लगे। उदाहरणार्थ गोदावरी नदी के दृष्टि गये उत्खनन बताते हैं कि उन्होंने ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी समीप टीलों पर अपनी बस्तियां स्थापित की। ये लोग पत्थर की कुल्हाडिको साथ-साथ पाषाण से बनाए गए फलकों को भी प्रयोग में लाते थे। यहाँ प्रा पत्थर की मूर्तियों से जानकारी मिली है कि वे अनेक तरह के जानवरों गाय-बै भेड़ और बकरियों को पालते थे। नवपाषाण कालीन अवशेष गंगा-सोन गंडक तथा घाघरा के मिलन स्थल चिरोड में मिले हैं। ये अवशेष हमें बताते हैं कि यहाँ के लोग गड्ढों वाले घरों में रहते थे तथा मालिक के शव के साथ-साथ पालतू दफनाने की प्रथा केवल नवपाषाण काल के लोगों में केवल यहीं पाई जाती थी। नवपाषाण कालीन अवशेष बुर्जहोम (श्रीनगर से करीब 20 किलोमीटर दूर), असम की पहाड़ियों, दक्कन में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कौड़कल, पैयमपल्ली (तमिलनाडु) आदि स्थानों पर भी मिले हैं।
(iii) पाषाण कालीन इतिहास के साथ आद्य इतिहास की रचना में भी अवशेष तथा उत्खनन विशेष सहायक हैं। उदाहरणार्थ पश्चिमोत्तर भारत में की गई अनेक स्थानों की खुदाई से प्राप्त अवशेषों ने प्रमाणित कर दिया कि लगभग 2500 ई.पू. भारत में अनेक नगरों की स्थापना हो गई थी।
(iv) उत्खननों से हमें गंगा घाटी में विकसित की गई भौतिक संस्कृति के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई है। इनसे पता चलता है कि उस समय के लोग किस प्रकार के मृत्भाण्ड उपयोग में लाते थे, किस प्रकार के घरों में रहते थे, भोजन में किन अनाजों का प्रयोग करते थे और किस प्रकार के औजारों या हथियारों का उपयोग करते थे।
(v) जहाँ एक स्थान पर मनुष्यों की बस्तियों के अनेक स्तर निकलते हैं वहाँ उनसे सभ्यता के विकास-क्रम पर प्रकाश पड़ता है जैसे कि कई स्थानों पर नीचे के स्तरों में हड़प्पा से पूर्व की संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं और ऊपर के स्तरों पर हड़प्पा संस्कृति से सम्बन्धित प्रमाण मिले हैं। जिन-जिन स्थानों पर एक ही आकृति के मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं उन्हें इतिहासकारों ने एक ही संस्कृति के
अन्तर्गत रखा है।
(vi) अवशेषों में मोहरें प्राप्त हुई हैं उनसे भी प्राचीन भारतीय इतिहास की रचना में सहयोग मिला है। उदाहरणार्थ मोहनजोदड़ो में करीब 600 मोहरें प्राप्त हुई हैं। उन्हीं के आधार पर हड़प्पावासियों के धार्मिक विश्वासों के बारे में अनुमान लगाना सम्भव हो सका है। इसी तरह प्राचीन वैशाली के बसाढ़ में 274 मिट्टी की मुहरें प्राप्त हुई हैं। उनसे यह जानकारी मिली है कि चौथी शताब्दी ईसवी में एक ही श्रेणी (cuild) में साहूकार, व्यापारी तथा माल ढोने वाले साथ-साथ सदस्य थे। यह श्रेणी गुप्तकाल से सम्बन्धित बताई जाती है।
संक्षेप में पुरातात्विक साधन अनेक हैं तथा वे भारतीय इतिहास की रचना में बडे सहायक हैं। इन्होंने भारतीय इतिहास को पहले की अपेक्षा अधिक तर्कसंगत ढंग से समझने में बड़ी मदद की है। इससे लेखकों की कल्पना का युग न होने के कारण यह तथ्यों तथा सत्य के अधिक नजदीक जान पड़ता है।

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