नन्द वंश के तिथिक्रम एवं उपलब्धियों


नन्द वंश के तिथिक्रम एवं उपलब्धियों का विवेचन कीजिए।

Chronology and achievements of the Nandas dynasty.

बौद्ध और जैन धर्म के अनुसार उदायि ही अजातशत्रु का उत्तराधिकारी था । उदायि ने मगध का शासन भार संभालते ही गंगा के दक्षिणी तट पर कुसुमपुर या पाटलिपुत्र की नींव डालकर उसे अपनी राजधानी बनाया । उदायी ने अवन्ति राज को युद्ध में परास्त कर अपने साम्राज्य में मिला लिया । बौद्ध साहित्य के अनुसार उदायी के पश्चात अनुरुद्ध, मुण्ड और नागदशक हुए। ये सभी पितृघाती थे । उदयन या उदायी के उत्तराधिकारियों के बारे में भी विद्वान एकमत नहीं हैं। पुराणों के अनुसार उदयन के पश्चात नन्दीबर्द्धन तथा महानन्दिनी मगध के शासक बने । किन्तु लेकी बौद्ध ग्रंथों के विपरीत अनुरुद्ध मुण्ड तथा नागदशक को उदयन का उत्तराधिकारी मानता है। महावंश के अनुसार उपरोक्त तीनों ही राजाओं ने अपने पिताओं का वध किया। अन्तिम सम्राट नागदशक के खिलाफ जनता ने विद्रोह कर दिया एवं उसे सम्राट पद से हटा उसके मंत्री शिशु नाग को राजा बनाया।

(3) शिशुनाग वंश के शासन में मगध - 

हर्यक वंश के पतन के पश्चात मगध पर शिशुनाग वंश के शासकों का शासन हुआ । इस वंश का प्रथम राजा शिशुनाग था जो हर्यक वंश के राजाओं के समय में काशी का मॉडलिक या प्रान्तपति रह चुका था। वह 407 ई.पू. में मगध के सिंहासन पर बैठा। राज्य प्राप्त करने के पश्चात उसने पाटलिपुत्र के स्थान पर राजगिरि या गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाया । उसने सर्वप्रथम अवन्ति पर आक्रमण किया
और उसके राजा को पराजित कर अवन्ति को मगध में सम्मिलित कर लिया। कालान्तर में उसने मध्य प्रदेश, मालवा, वत्स और कौशल राज्यों को भी हराकर अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। पंजाब व सीमान्त को छोड़कर समस्त उत्तरी भारत मगध साम्राज्य के अधीन आ गया । शिशुनाग ने बौद्ध साहित्य के अनुसार 18 वर्ष तक मगध पर शासन किया। | काकवर्ण का कालाशोक - पुराणों के अनुसार शिशुनाग के बाद उसका पुत्र काक वर्ण मगध की गद्दी पर बैठा किन्तु सिंहली गाथा के अनुसार उसका नाम काला शोक दिया है। वह 393 ई.पू. में गद्दी पर बैठा और उसने बौद्ध साहित्य के अनुसार 28 वर्ष तक शासन दिया। इसके विषय में यह कहा गया है कि वह राजा बनने से पूर्व काशी का माँडलिक रहा था। कालाशोक के समय में दो मुख्य कार्य हुए
(1) दूसरी बौद्ध सभा का वैशाली में आयोजन एवं
 (2) पाटलिपुत्र को पुन: मगध की राजधानी बनाना ।
कालाशोक ने दक्षिणी भारत में कलिंग, काश्मीर और पंजाब के शासकों को परास्त किया लेकिन इन राज्यों को अपने राज्य में नहीं मिलाया । कालाशोक के दस पत्र) जिन्होंने संयुक्त रूप से मगध पर शासन किया। इस वंश का अन्तिम शासक नन्दवर्ड जो अत्यन्त विलासी और व्यभिचारी था। उसके शासन में राजा के महल में अनेक पुरय होने लगे । अन्त में महापद्म नन्द जो उसकी शूद्र रखैल का पुत्र था, उसने धोखे से काला शोक की हत्या कर दी तथा उसके बाद वह कालाशोक के दस पुत्रों का संरक्षक बन गया । कालान्तर से एक एक करके उनका वध करता गया ।अन्त में उसने शक्ति हथिया ली तथा प्रथम नन्द उग्रसेन को मगध का राजा घोषित कर दिया। इस तरह शिशुनाग वंश का अन्त हो गया एवं मगध पर नन्द वंश का शासन प्रारम्भ हुआ।

(4) नन्दवंश और मगध - 

डा.राजबली पाण्डेय ने लिखा है नन्द वंश में नौ राजा हुए जिनको नवनन्द कहते थे। महाबोधि वंश के अनुसार नव नन्दों के नाम इस प्रकार हैं। उग्रसेन, पण्डुक, पण्डुपति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गौविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त और घनानन्द । इनमें प्रथम उग्रसेन पिता था और शेष लड़के । उग्रसेन को ही पुराणों में महापद्मनन्द कहा गया है और वह इसी नाम से अधिक प्रसिद्ध है महापद्म नन्द को ही भारत का प्रथम महान ऐतिहासिक सम्राट मान सकते हैं। |

(1) नन्द उग्रसेन या महापद्मनन्द - 

शिशुनाग वंश के अन्तिम सम्राट कालाशोक के बाद मगध में नन्द वंश का शासन स्थापित हो गया। प्रथ नन्द उग्रसेन के नाम से जाना जाता है। महापद्म नन्द एक योद्धा और कुशल प्रशासक था उसने एक विशाल सेना की स्थापना की और उसकी सहायता से उसने मगध के शत्रुओं को बार बार परास्त कर मगध के गौरव को अक्षुण्ण बनाये रखा उसके समय में पंजाब के पूर्व का समस्त उत्तरी भारत और दक्षिण में कलिंग मगध साम्राज्य का अंग था । महापद्मनन्द ने ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर काफी अत्याचार किया। इस संबंध में एक किंवदन्ती है कि उसने यह कहा कि वह परशुराम की भाँति पृथ्वी के सभी क्षत्रियों का अन्त कर एक छत्र सम्राट की भाँति शासन करेगा। उसका क्षत्रिय तथा ब्राह्मण विद्रोह यह इंगित करता है कि वह स्वयं क्षत्रिय नहीं था। उसने जनता पर अनेक कर लगाये जिससे जनता उसके विरुद्ध हो गई । 329 ई.पू. में महापद्मनन्द की मृत्यु हो गयी।
| प्रो.जी.पी सिंहल लिखते हैं कि “यह कम आश्चर्य की बात न थी कि दासी पुत्र और आयु में वृद्ध होकर भी उसने परिस्थितियों के विरुद्ध सफलतापूर्वक युद्ध किया तथा मगध के नाम पर चार चाँद लगाये । प्राप्त प्रमाणों के अनुसार उसने यदि धन संग्रह के लिए अवाँछनीय उपायों का आश्रय लिया तो सिंचाई आदि सार्वजनिक कार्यों पर भी ध्यान दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसकी गणना भारत के महान सम्राटों में की जानी चाहिए उसके हाथी गुम्फा अभिलेख के अनुसार सम्भवतः उसका झुकाव जैन धर्म की ओर था।”

(2) महापद्मनन्द के उत्तराधिकारी - 

महापद्मनन्द के पश्चात उसके आठ पुत्रों ने कुल मिलाकर 12 वर्ष तक शासन किया। महापद्मनन्द के ये सभी उत्तराधिकारी असफल शासक थे । इस वंश का अन्तिम शासक घनानन्द था । घनानन्द बहुत वैभवशाली था । उसके पास शाहजहाँ की तरह अपार धन था ! उसके विषय में एक जनश्रुति प्रसिद्ध है कि उसने अपने कोष को गंगा नदी के तल में छिपाया था। उसके पास कथा सरित सागर के अनुसार 99 करोड़ का स्वर्ण था। उसने यह धन किस प्रकार एकत्रित किया इस विषय में कहा जाता है कि वह बहुत लालची था तथा उसने धन प्राप्त करने के लिए अनेकों कर लगाये एवं उनकी कठोरता से वसूल किया। नन्दवंशीय शासकों ने हिन्दुओं का अपमान कर उन्हें रुष्ट कर दिया। नन्द राजाओं को प्रजा नीच कल का मानती थी जब चन्द्रगुप्त द्वारा नन्दों के विरुद्ध आभयान शरू किया तो प्रजा ने उसका साथ दिया । अन्त में चन्द्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य (चाणक्य) का मदद से इस वंश का शासन समाप्त कर दिया और मगध पर मौर्य वंश का शासन स्थापित हो गया ।। | 

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