Describe briefly the social and Political conditions of Vedic Age.


प्रश्न 3. वैदिक युग की सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

Describe briefly the social and Political conditions of Vedic Age.
अथवा
वैदिक युग से क्या तात्पर्य है? आर्यकालीन वैदिक सभ्यता का वर्णन कीजिए । तर वैदिक काल में वैदिक सभ्यता में क्या प्रगति की ?
What do understand by the Vedic Age ? Describe the civilization of the Aryans in the early Vedic period? What progress did it make in the Vedic Age ? ।
अथवा
पूर्व वैदिकालीन राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
Give a brief account of the political and social conditions in early vadic? ।
अथवा
“आश्रम व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Writ short note on Ashram System.
अथवा
उत्तरवैदिक काल में आर्यों की सभ्यता का समीक्षात्मक विवरण दीजिए।
Give a critical account of the Aryan civilization during the later Vedic period.
अथवा
वर्ण व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। Write Short note on Varna System.
उत्तर - वैदिक काल से तात्पर्य - वैदिक या वेद शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की “विद” धातु से है जिसका अर्थ जानना होता है। वेद आर्यों के वे धर्म ग्रन्थ हैं जिनमें आर्यों के अनुभव और ज्ञान का भण्डार है। ये संख्या में चार हैं जिनमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना जाता है। जब भारतीय आर्य देश में भली प्रकार से बस गये और दस्युओं के विरुद्ध अनेक युद्ध समाप्त प्रायः हो गये तो उन्होंने उच्चतम मानवीय आदर्शों की खोज करना प्रारम्भ किया और उनकी इस खोज के फलस्वरूप ही वेदों की रचना हुई । “वैदिक काल” से तात्पर्य भारतवर्ष के उस ऐतिहासिक काल से है जिसमें वेदों की रचना हुई और उनके आधार पर आर्य संस्कृति का विकास हुआ।
सिन्धुघाटी की सभ्यता के पश्चात भारत में वैदिक कालीन सभ्यता का ही उदय हुआ। खान-पान, वेश-भूषा, धर्म, वर्ण-व्यवस्था, शासन-प्रणाली, कला- कौशल और व्यापार उद्योग में इस काम में एक विशेष प्रकार की संस्कृति ने जन्म लिया जो उत्तर काल की संस्कृतियों से भिन्न है। इसके निर्माण में वेदों का पूर्ण हाथ था। यही कारण है कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसको “वैदिक काल” की संज्ञा दी जाती है। यह काल दो भागों में बांटा गया है ।-एक पूर्व वैदिक युग और दूसरा उत्तर वैदिक युग। ये अलग-अलग काल नहीं हैं। वैदिक युग की सांस्कृतिक प्रगति के ही दो क्रमिक स्वरूप हैं।

पूर्व वैदिकालीन राजनीतिक और सामाजिक

इस युग में आर्यों ने भारत के सभी प्रान्तों में आर्य संस्कृति का प्रसार किया । यहाँ की आदिम जातियों को भी सभ्यता का पाठ पढ़ाया। पूर्व वैदिक युग अधिक महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इसी काल में स्थायी आर्य-सिद्धान्तों और संस्थाओं का विकास हुआ । वैदिक काल . लगभग 2500 वर्षों तक चला।

| पूर्व वैदिककाल की सामाजिक दशा 

(1) आर्यों का सामाजिक वर्गीकरण :
वर्ण व्यवस्था - पूर्व-वैदिक या ऋग्वैदिक काल में वास्तव में वर्ग नहीं थे। समाज के कार्य कलापों को व्यवस्थित करने के लिए सम्पूर्ण समाज चार वर्षों में विभाजित कर दिया गया था - ये चार वर्ण थे -ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्र ।। ब्राह्मण वर्ग धार्मिक कृत्यों को सम्पन्न कराता था। इस वर्ग का काम था पठन-पाठन तथा धार्मिक क्रिया कलापों का संचालन- सम्पादन । क्षत्रिय वर्ग के लोगों का कार्य नागरिकों की रक्षा करना, आक्रमणकारियों से युद्ध करना और सम्पूर्ण समाज की धन सम्पत्ति की रक्षा करना। था । वैश्य वर्ग के लोग वाणिज्य व्यापार आदि कार्य करने वाले थे। चतुर्थ वर्ग शूद्रों का था। जो उपर्युक्त तीनों वर्गों की सेवा करते थे। यह वर्ग केवल कार्य-विभाजन के लिए ही था । वास्तव में आर्यों का पूरा समाज एक ही वर्ग जैसा था । एक ही परिवार में एक सदस्य योद्धा दूसरा पुरोहित अथवा तीसरा सेवक हो सकता था ।इन सभी वर्गों में खान पान तथा वैवाहिक निकटतम सम्बन्ध थे। लोगों को किसी भी वर्ग का कार्य सम्पादन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी । वेदों में कई दृष्टान्त ऐसे देखने को मिले हैं जिनमें राजकन्या का विवाह किसी ब्राह्मण ऋषि के साथ सम्पन्न हो गया अथवा किसी राजपुत्र ने वैश्य कन्या से विवाह कर लिया । वर्ण व्यवस्था वैदिक युग की प्रमुख विशेषता रही।

(2) परिवार - 

पूर्व वैदिक काल में सारे समाज का आधार परिवार था । आर्य-कालीन समाज व्यवस्था पितृसत्तात्मक थी । स्वायत्त शासन की छोटी से छोटी इकाई परिवार थे जिसका स्वामी या कर्ता पिता होता था। उसका परिवार के प्रत्येक सदस्य पर निरंकुश अधिकार रहता था किन्तु यज्ञ और अन्य पारिवारिक कार्यों में पत्नी के परामर्श और सहयोग को भी आदर की दृष्टि से देखना वह अपना कर्तव्य समझता था। समस्त परिवार की रक्षा और उनके पालन-पोषण का दायित्व गृहपति पर होता था। वैदिक युग- संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी । पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी धन-सम्पत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र हुआ करता था । कभी कभी यह बंटवारा सभी पुत्रों में समान रूप से भी हो जाता था। जिस पुरुष के लड़का नहीं होता था, उसकी लड़की उत्तराधिकारिणी मान ली जाती थी। बहुत से परिवारों से मिलकर जाति बनती थी। ऋग्वेद में तत्कालीन अनेक जातियों का उल्लेख हुआ है जिनमें पुरु, अनु, मत्स्य, भारत इत्यादि प्रमुख हैं। |

(3) स्त्रियों की स्थिति - 

वैदिक समाज में स्त्रियों का स्थान अत्यन्त सम्मानजनक था। पारिवारिक जीवन में स्त्री के अधिकार पुरुषों के बराबर थे। वह यज्ञ में अपने पति के साथ बैठकर धार्मिक कृत्य में भाग लेती थी । भिक्षुकों को दान-दक्षिणा देते समय भी उसकी सहभागिता अवश्य समझी जाती थी पूर्व वैदिक काल में पर्दे की प्रथा नहीं थी और सामाजिक समारोहों में वे बे-रोक-टोक भाग लेती थीं । पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था। कई विदुषी महिलाओं द्वारा वेद की ऋचाओं को निर्मित करने का उल्लेख आर्य ग्रन्थों में हुआ है। लोपामुद्रा, घोषा, विश्वधारा, सदार्णवी आदि ऐसी ही महिलायें थीं। स्वयंवर की प्रथा अभी प्रचलित नहीं हुई थी किन्तु कभी कभी माता पिता की अनुमति से लड़कियाँ स्वयं अपने पति चुन लिया करती थीं । सामान्यतः एक पत्नी विवाह प्रचलित था किन्तु राजा या कुलाधिपति एक से अधिक पत्नियाँ भी रखते थे। विधवा विवाह की आज्ञा थी किन्तु उसका प्रचार बहुत सीमित था । लड़की पैतृक सम्पत्ति में वंचित थो किन्तु पिता के कोई पुत्र न होता था तो पिता की सम्पत्ति की वह उत्तराधिकारिणी हो जाती थी । स्त्रियों का प्रमुख कर्तव्य परिवार की आन्तरिक व्यवस्था करना था। स्त्री बचपन में पिता के, यौवनावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहती थी भ्रातृहीन लड़की को समाज में आदर प्राप्त नहीं था। विधवा विवाह को भी मान्यता मिली हुई थी। |

(4) वेश भूषा तथा वस्त्रालंकरण - 

आर्यों की वेश भूषा साधारण थी । पुरुषों के वस्त्र में 3 वस्त्र प्रमुख होते थे। शरीर के ऊपरी भाग के लिए उत्तरीय और कमर से निचले भाग के लिए अधोवस्त्र जो “निवी” कहलाता था । पगड़ी पहनने का भी रिवाज था जिसे स्त्री- पुरुष दोनों ही धारण करते थे । वस्त्र-सूत, ऊन, अलसी के रेशे या मृग चर्म से बनते थे । विवाह के अवसर पर वधू को एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनाया जाता था जो “वाधूय” कहलाता था। नर्तकियों “पेशस” नामक वस्त्र धारण करती थी । उत्तरीय या शाल के किनारों पर सुनहरी तारों का अलंकरण होता था । विशेष अवसरों पर आर्य स्त्री- पुरुषों को नये वस्त्र धारण करने का शौक था । बालों में सुगन्धित तेलादि लगाये जाते थे और स्त्रियाँ वेणियां गूंथती थीं । पुरुर्षों के प्रायः दाढ़ी होती थी, किन्तु हजामत करके साफ मुंह रखने का भी चलन था । | आर्य लोगों को आभूषण पहनने का शौक था । आभूषणों में हार, कुण्डल, वलय (कड़े) और गजरे आदि प्रमुख थे। कानों में कर्णफूल और बाँहों में बाजूबन्द जैसा आभूषण पहिना जाता था।

(5) खान-पान - 

आर्यों का मुख्य भोजन जौ और गेहूं था। घृत, दूध, दही, तक्र और फलादी का व्यापक रूप में उपयोग होता था। चावल और क्षीर उनके प्रिय खाद्य पदार्थ थे। माँस भी खाद्य पदार्थ में शामिल था। यज्ञादि में बलि दिये हुये साँड़, बकरे या भेड़ आदि का माँस खाया जाता था किन्तु गौ माँस सेवन वर्जित था। सुरा पान हेय दृष्टि से देखा जाता था किन्तु आर्य पुरुष और स्त्रियाँ एक हल्की सुरा जिसे “सोमरस” कहा जाता था प्रयोग में लाती थी। यज्ञादि और विवाहोत्सवों पर सोमपान खुलकर होता था । उड़द-मूंग और भुने हुए चनों का सत्तू भी भोजन में शामिल था।

| (6) विवाह संस्कार - 

जैसा की पूर्व में लिखा जा चुका है आर्यों में एक पत्नी प्रथा प्रचलित थी किन्तु राजाओं और मण्डलाधीशों में बहु विवाह की प्रथा भी व्यवहत थी । ये लोग एक से अधिक पत्नियाँ रखते थे। लड़के लड़कियों को विवाह की स्वतन्त्रता थी किन्तु माता पिता की अनुमति लेना आवश्यक समझा जाता था। जैसा कि आजकल भी हिन्दुओं में होता है वर पक्ष के लोग वधू के घर बारात लेकर जाते थे । विवाह संस्कार मंत्रोच्चारण और यज्ञादि के साथ सम्पन्न होता था । समस्त वैवाहिक प्रक्रिया पुरोहित की देख रेख में की जाती थी। वर वधू अग्नि की परिक्रमा करके पति पत्नी के सूत्र में बंधते थे। विधवा विवाह और नियोग प्रथा दोनों को समाज से मान्यता प्राप्त थी । बाल विवाह नहीं होते थे वयस्क युवक-युवतियाँ ही विदाह करती थीं।

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