Discuss the Chronology and achievements of the Nandas dynasty.


 नन्द वंश के तिथिक्रम एवं उपलब्धियों का विवेचन कीजिए। 

Discuss the Chronology and achievements of the Nandas dynasty.
अजातशत्रु द्वारा वैशाली विजय - अजातशत्रु को लिच्छिवि की राजधानी वैशाली पर आक्रमण करने का भी कारण मिल गया। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार युद्ध का कारण यह दिया गया है कि बिम्बिसार ने चेलना के अन्य दो पुत्र हल्ला और बहल्ल को रत्नाहार और हाथी दे दिये । सम्राट बनने के पश्चात इन दोनों चीजों की अजातशत्रु ने उन्हें मॉग की किन्तु उन्होंने यह लोटाने से इन्कार कर दिया और अपने नाना के यहाँ चले गये । मामा से अजातशत्रु ने उन्हें सौंप देने को कहा किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया इस पर अजातशत्रु बहुत आक्रोश में भर उठा ।।
अन्य सूत्रों के अनुसार झगड़ा एक हीरे की खान को लेकर भी था इसे युद्ध का दूसरा कारण माना जाता है। हीरे की खान मगध और वैशाली दोनों के सम्मिलित अधिकार में थी किन्तु लिच्छिवियों ने इस खान पर स्वयं का अधिकार करने के उद्देश्य से सम्मिलित अधिकार का पैक्ट तोड़ दिया। इस पर अजातशत्रु क्रोध से पागल हो उठा। किन्तु वह वैशाली पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया क्योंकि वैशाली सैन्य दृष्टि से अधिक शक्तिशाली राज्य था। अजातशत्रु वैशाली में लिच्छिवियों की शक्ति का पतन देखने का इच्छुक था वह प्रयत्न भी कर रहा था कि युद्ध किया जाय अथवा नहीं। निर्णय न कर पाने की स्थिति में अजातशत्रु ने अपने मंत्री वर्षाकार को महात्मा बुद्ध से परामर्श हेतु भेजा कि वैशाली पर आक्रमण किया जाय या नहीं। महात्माबुद्ध ने वर्षाकार से सात प्रश्न किए जिनको “सप्त अपरिहाणिसुत्त” कहते हैं। बुद्ध के प्रश्नों का उत्तर उनके शिष्य ने हाँ में दिया तब बुद्ध ने वर्षाकार से कहा कि राजा की समस्या का हल केवल धन देकर या मित्रता स्थापित कर ही सम्भव है।

अजातशत्रु द्वारा कूटनीति का आश्रय - 

अजातशत्रु लिच्छिवियों को किसी भी तरह से नीचे दिखाना चाहता था अर्थात उनकी शक्ति को क्षीण कर मगध साम्राज्य को सुदृढ़ बनाना चाहता था । अजातशत्रु के मंत्री वर्षाकार ने कूटनीति से पहले तो वैशाली में फूट उत्पन्न की । इस फूट के कारण वहाँ अशान्ति फैल गई। अवसर का लाभ उठाने हेतु अजातशत्रु ने आक्रमण की तैयारी की। उसने अपनी सीमा की सुरक्षा की दृष्टि से गंगा के किनारे एक बड़ा किला बनवाया ।
बौद्धों के अनुसार इस किले का उदघाटन स्वयं बुद्ध से कराया । यही स्थान बाद में पाटलिपत्र कहलाया। इस युद्ध में महाशिला कटंक एवं रथमसल जैसे भयंकर अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग किया। यह युद्ध 16वर्ष चला और अपनी आन्तरिक फूट के कारण लिच्छिवियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा और मगध नरेश विजयी हुआ । इस प्रकार प्राचीन भारत के एक प्रमुख गणराज्य का अन्त हो गया और मगध साम्राज्य की नींव और सुदृढ़ हो गयी।

अजातशत्रु द्वारा अवन्ति के विरुद्ध सतर्कता - 

अजातशत्रु ने राजधानी के चारों तरफ एक सुदृढ दीवार का निर्माण कराया । ताकि वह अवन्ति के राजा प्रद्योत के किसी भी आक्रमण को रोक सके। अवन्ति नरेश प्रद्योत अपनी विस्तारवादी नीति का अनुसरण करते हुए अपने पड़ोसी राज्य वत्स को अपने अधिकार में ले चुका था । वह मगध की बढ़ती हुई शक्ति से ईर्ष्या करता था । अतः अजातशत्रु को वैशाली से युद्ध में फंसा देख मगध पर आक्रमण कर उसकी शक्ति को क्षीण करने का विचार किया लेकिन उसकी मनोभावना का अजातशत्रु को पता चल गया और अवन्ति नरेश अपने स्वप्न को साकार न कर सका ।।

साम्राज्य की सीमा - 

कुणिक अजातशत्रु ने अपने युद्ध कौशल एवं पराक्रम तथा कूटनीति के माध्यम से मगध साम्राज्य की सीमा में वृद्धि की एवं उसे सुदृढ़ बनाया । उसके साम्राज्य में काशी, अंग एवं वैशाली राज्य शामिल होने से इसका साम्राज्य का क्षेत्र बढ़ गया। इतिहासकार घोष ने अजातशत्रु के पराक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा है कि “बिम्बिसार के कुल में अजातशत्रु का राज्यकाल शक्ति के शिखर पर था।”
अजातशत्रु की धार्मिक नीति - धार्मिक मामलों में अपने पिता बिम्बिसार की तरह अजातशत्रु भी उदार था और अपने समय के सभी धर्मों का आदर करता था। जैन धर्मावलम्बी उसे जैन एवं बौद्ध धर्मावलम्बी उसे बौद्ध मानते थे लेकिन उस पर पहले जैन मत का विशेष प्रभाव था परन्तु पीछे बौद्ध धर्म से वह विशेष प्रभावित हुआ। अपने पिता बिम्बिसार की मृत्यु के पश्चात तो वह महात्मा बुद्ध का भक्त हो गया । सुमंजल विलासिनी के आधार पर इतिहासकार घोष ने एक घटना का उल्लेख किया है। जिसके अनुसार बुद्ध ने कुशीनारा में शरीर त्याग किया, जो मल्लों की राजधानी थी । बुद्ध के दाह संस्कार के पश्चात अजातशत्रु ने मल्लों से बुद्ध की अस्थियों का भाग मांगा । उसने कहा था कि “बुद्ध क्षत्रिय थे तथा मैं भी क्षत्रिय हूं । अतः मैं उनके अवशेष प्राप्त करने का अधिकारी हूं।” अजातशत्रु ने जो अस्थियां प्राप्त की उनके लिए उसने राजगिराि के पास एक स्तूप बनवाया। बुद्ध के निर्वाण के पश्चात अजातशत्रु के जीवन काल में ही राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में बौद्ध धर्म की प्रथम धार्मिक सभा का अधिवेशन हुआ । इससे स्पष्ट है कि बाद में अजातशत्रु बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था । इतिहासकार स्मिथ का कहना है कि अजातशत्रु ने अपना संरक्षण केवल एक ही धर्म । को नहीं दिया बल्कि बौद्ध तथा जैन दोनों धर्मों को दिया।

अजातशत्रु की मृत्यु -

डा.राजबली पाण्डेय ने लिखा है कि अपने जीवन के अन्तिम समय में अपने पितृघात का प्रायश्चित उसे करना पड़ा। वह भी अपने प्रिय पुत्र उदायों के षडयन्त्र से मारा गया। अजातशत्रु ने 32 वर्ष राज्य किया तथा 453 ई.पू. में उसकी मृत्यु हो गई।

(ग) अजातशत्रु के उत्तराधिकारी- 

अजातशत्रु के उत्तराधिकारियों के सम्बन्ध में मजूमदार, राय चौधरी एवं दत्त ने लिखा है - “पुराणों के अनुसार अजातशत्रु का निकटतम उत्तराधिकारी दर्शक था जिसके पश्चात उसका पुत्र उदायि गद्दी पर बैठा। दर्शक का नाम स्वप्नवासवदत्तम् नामक नाटक में भी आता है जिसकी रचना भास द्वारा हुई बताई जाती है। उस नाटक में दर्शक को कौशाम्बी के राजा उदयन का साला और समकालीन दिखाया गया। है ।ले किन बौद्ध एवं जैन लेखक एकमत होकर कहते हैं कि उदायि अजातशत्रु का पुत्र था और अपने पिता की मृत्यु के पश्चात गद्दी पर बैठा । बिम्बिसार के वंश के राजाओं की सूची के अन्त में बौद्ध लेखक नागदास नामक एक राजा का नाम रखते हैं। जिसे कुछ लोग पुराण में वर्णित राजा दर्शक मानते हैं। बौद्ध परम्परा की प्राचीनता की दृष्टि से दर्शक और अजातशत्रु के साथ उदायि के सम्बन्ध में पौराणिक कथन को सत्य मानना कठिन है।

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