Give a brief account of the rise of Magadhan empire before the Nands.


प्रश्न 16, नन्दों से पूर्व मगध साम्राज्य के उदय का संक्षिप्त विवरण दीजिए?

Give a brief account of the rise of Magadhan empire before the Nands.
अथवा मगध के साम्राज्यवाद की बिम्बिसार , अजातशत्रु तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में व्याख्या कीजिए।
Discuss the Magadhan Imperialism under Bimbisara, Ajata Shatru and his successors.
अथवा हर्यकों और शिशुनागों के अधीन मगध साम्राज्य के विस्तार का निरूपण कीजिए।
Trace the expansion of Magadhan Empire under the Haryanks and shishunaga.
अथवा मगध का उदय किन परिस्थितियों में हुआ ? इसमें बिम्बिसार के योगदान को मूल्यांकन कीजिए ?
What led to the rise of Magadha? Give an estimate of the Contribution of Bimbisara to it.
अथवा नन्द वंश के तिथिक्रम एवं उपलब्धियों का विवेचन कीजिए। Discuss the Chronology and achievements of the Nandas dynasty.
अथवा उत्तर - ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तरी भारत में दो प्रकार के राज्य विद्यमान थेगणतंत्र और राजतंत्र । इन गणतंत्रों में कपिलवस्तु के शाक्य, सुसमारगिरि के भर्ग, पिप्पलिवन के मौर्य आदि । इन गणतंत्रों को शीघ्र ही एक पड़ोसी राज्यों के महत्त्वाकांक्षी राजाओं के रूप में शक्तिशाली शत्रुओं का सामना करना पड़ा। औरों की अपेक्षा चार राजतंत्रात्मक राज्य बहुत प्रसिद्ध और शक्तिशाली हो गये और अपने पड़ोसी राज्यों को हराकर विस्तार और शक्ति वृद्धि की नीति का अनुसरण करने लगे। (1) मगध (2) कौसल (3) वत्स (4) अवन्ति के राज्य थे । इनमें मगध ही साम्राज्य बनाने में समर्थ हुआ। नीचे हम मगध साम्राज्य के उदय और विस्तार के विविध चरणों का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं।

(1) मगध राज्य की स्थापना - 

कुरुवंशीय वसुदेव के पुत्र बृहद्रथ को इतिहासकार मगध राज्य का संस्थापक मानते हैं। वसुदेव स्वयं ऐतिहासिक पुरुष थे कहा जाता है कि गिरिव्रज की स्थापना इन्हीं ने की वृहद्रथ की राजधानी गिरिव्रज ही थी । मगध का राज्य उस समय छोटा ही था । सभी प्राप्त तथ्यों के आधार पर वर्तमान पटना तथा गया जिले मगध का अनिवार्य अंग रहे थे। उत्तर में गंगा तथा दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत और पश्चिम में स्पेन नदी तथा पूर्व में चम्पा नदी इसकी सीमा थी । मगध के उत्कर्ष में इसकी भौगोलिक स्थिति का बड़ा हाथ था । इसका गढ़ पहाड़ी जंगलों से घिरा होने के कारण सुरक्षित था ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि वृहद्रथों का राज्य काल 16वीं शताब्दी ई.पू. से छठी शताब्दी ई.पू. तक रहा। वृहद्रथ वंश का जरासंध नाम का राजा बड़ा महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी था। वह वृहद्रथ का पुत्र था । महाभारत काल में इस राजा ने कई युद्ध किये । उसने सुरक्षा की दृष्टि से अपनी राजधानी के चारों ओर एक दीवार बनवाई। जरासंध की साम्राज्यवादी योजना को पाण्डव कृष्ण संघ ने विफल कर दिया । जरासंध के पश्चात पुराणों के अनुसार वृहद्रथ वंश के कई राजा हुए किन्तु इनकी संख्या के विषय में सभी ग्रंथ एकमत नहीं हैं। यदि वृहद्रथ वंश के एक हजार वर्ष का शासन काल सही है तो राजाओं की संख्या 32 उचित प्रतीत होती है। राजबली पाण्डेय के अनुसार जरासंध के पश्चात मगध की शक्ति शिथिल हो गई। जरासंध के कई पुत्र गद्दी पर बैठे लेकिन वे निकम्मे साबित हुए। इनका अन्तिम शासक रिपुंजय था। रिपुंजय के पश्चात मगध का शासक बालक बना जो रिपुंजय के मंत्री का पुत्र था। बालक भी अधिक दिनों तक शासन भार नहीं संभाल सका । भट्टीय नामक एक सामन्त ने उपार्जित कर अपने पुत्र बिम्बिसार को मगध का शासक बना दिया। बिम्बिसार हर्यक वंश का था। |

(2) हर्यक वंश के शासन में मगध -

 ईसा से लगभग 543 वर्ष पहले बिम्बिसार ने मगध में हर्यक राजवंश की स्थापना की अधिकांशतः मान्यता यह ही है कि बिम्बिसार हर्यक वंशी था उसने ही हर्यक वंश की स्थापना की । इस वंश में कई प्रतापी शासक हुए जिनमें बिम्बिसार, अजातशत्रु तथा उदयन अधिक प्रसिद्ध हुए।

(क) बिम्बिसार - 

बिम्बिसार ने ही मगध साम्राज्य की नींव डाली थी । उसका पिता भट्टीय एक साधारण सामन्त था सम्भवतः इसी कारण ही बिम्बिसार का दूसरा नाम श्रेणिक (सैनिक) पड़ा । बिम्बिसार के काल क्रम के संबंध में मजूमदार, रायचौधरी एवं दत्त का मत हैं। कि “हर्यक वंश का सबसे अधिक महत्त्व पूर्ण राजा श्रेणिक या बिम्बिसार था, जो केवल 15 वर्ष की अवस्था में ही अपने पिता के द्वारा राजपद के लिए अभिषिक्त हुआ था। श्री लंका की परम्परा के अनुसार यह घटना बुद्ध के परिनिर्वाण से 60 वर्ष पहले घटी थी । सीलोन की। गणना के अनुसार परिनिर्वाण 544 ई.पू. में हुआ और 489 ई. केण्टन अनुश्रुति के अनुसार परिनिर्वाण 586 ई.पू. में हुआ । बुद्ध के परिनिर्वाण का 544 ई.पू. में होना लंका के इतिहास के कथन से सामंजस्य नहीं रखता कि अशोक का अभिषेक बुद्ध के निर्वाण के 218 वर्ष बाद किया गया था क्योंकि अशोक तीसरी शताब्दी ई.पू. में हुआ था। इस कथन का कुछ चीनी और चोल समकालीनताओं ने गीगर और कतिपय अन्य विद्वानों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि बुद्ध का निर्वाण काल 544 ई.पू. में होना अपेक्षाकृत आधुनिक मनगढन्त है और बुद्ध की मृत्यु की ठीक तिथि 483 ई. पू. है जो कि कैण्टन की अनुश्रुति से सम्मत तिथि के बहुत समीप है। 

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