Writ short note on Ashram System.


“आश्रम व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Writ short note on Ashram System.

आर्य लोगों का मुख्य भोजन गेहूं, जौ, चावल, दूध, दही, शहद और घृत था। यज्ञों में बलि दिये हुए पशुओं का मांस भी सेवन किया जाता था। क्षीरोदन और तिलोदन आदि का प्रयोग होता था। सोमरस-पान बदस्तूर जारी रहा। उत्सव समारोहों के अवसर पर स्त्री पुरुष दोनों ही सोमरस पीते थे । सुरा का प्रचलन था किन्तु सुरापान हेय दृष्टि से देखा जाता था। |

(7) आमोद-प्रमोद - 

आर्यों के सामाजिक जीवन में आमोद-प्रमोदों का विशेष स्थान था। रथ दौड़ और घुड़ दौड़ों का विशेष अवसरों पर आयोजन किया जाता था। आखेट भी मनोरंजन का एक महत्त्वपूर्ण अंग था । जुए का शौक आर्यों में व्यापक रूप में था। नृत्य संगीत मनोविनोद के विशेष अंग थे।
पूर्व वैदिक काल में राजनैतिक अवस्था - प्रारम्भ में जब आर्यों ने भारत में प्रवेश किया तो उनके भिन्न भिन्न समूह अपने पशुओं के लिए चारे की तलाश में यत्रतत्र घूमते रहते थे। किन्तु कालांतर में आर्यों ने कृषि करना आरम्भ कर दिया और एक स्थान पर टिक कर रहना अनिवार्य हो गया । कई आर्य परिवार जब एक साथ एक ही स्थान पर रहने लगे तो प्राओं का उदय हुआ। ग्राम बन जाने पर उनकी व्यवस्था की ओर उनका ध्यान गयो । पूर्व वैदिक काल की अन्तिम अवधि तक इन लोगों ने एक प्रकार का राजनैतिक संगठन विकसित कर लिया जिसके मुख्य 5 अंग थे - कुटुम्ब ग्राम, विश, जन और राष्ट्र । इस क्रमबद्ध राजनैतिक संगठन को निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है

(1) कुटुम्ब या परिवार - 

आर्य-राजनैतिक संगठन की कुटुम्ब सबसे छोटी इकाई थी। आर्यों की कौटुम्बिक संरचना अत्यन्त सुदृढ़ एवं सुगठित थी । प्रत्येक कुटुम्ब का एक मुखिया होता था जो कुलपति अथवा गृहपति कहलाता था । परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति (पिताप्रपितामह आदि) गृहपति माना जाता था। कुलपति अपने परिवार का सर्वेसर्वा था और परिवार के सभी सदस्य उसकी आज्ञाओं को शिरोधार्य करते थे। परिवार का भरण-पोषण, सुरक्षा और उसके धार्मिक कार्यों का निर्वहन कुलपति के दायित्व थे।

| (2) ग्राम - 

कई परिवारों की बनावट को ग्राम की संज्ञा मिली हुई थी। ग्राम की व्यवस्था एवं रक्षा के लिए एक मुखिया नियुक्त किया जाता था जो “ग्रामणी” कहलाता था। ग्राम प्रशासक का यह पद किसी अनुभवी और प्रतिष्ठित व्यक्ति को मिलता था। ग्रामणी को गाँव वाले चुनते थे या उसकी नियुक्ति राजा द्वारा होती थी । इस विषय में ऋग्वेद कोई सूचना नहीं देता है। किन्तु यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि समस्त ग्रामवासी उनका काफी सम्मान करते थे।

| (3) विस् - 

कई गाँवों के संकलन से “विस्” बनता था। विस् का मुख्याधिकारी विस्पति” होता था। विस् कितने ग्रामों से बनता था ? इसका आकार कितना बड़ा होता था। यह तहसील की तरह होता था या परगने की तरह ? ऋग्वेद इस दिशा में कोई जानकारी नहीं देता।

(4) जन - 

कई “विस” मिलकर “जन” का निर्माण करते थे। “जन” का मख्याधि गोप” कहलाता था। ऋग्वेद में “पंचजन” का उल्लेख हुआ है। ये पंचजन थे फंस सर्व यदु, अनुज्ञ तथा वृक्ष ।।

| (5) राष्ट्र - 

बहुत से “जनों” से राष्ट्र का निर्माण होता था । राष्ट्राधिपति राजा होता था। वास्तव में उस समय राष्ट्र का वह स्वरूप नहीं था जो आजकल संघात्मक राष्ट्रों में देखने को मिलता है । मोटे तौर पर राष्ट्र “जनों” का संकलन था । जिनमें प्रायः एक से अधिक जाति के लोग निवास करते थे तथा जिन पर राजा का एक छत्र शासन रहता था।

(6) राजा - 

राष्ट्र की समस्त शासन व्यवस्था का संचालक और नियामक राजा था। राजा शास्ता भी था और प्रमुख न्यायाधीश भी । आर्यों की मान्यता थी कि राजा में दैवी शक्ति निहित होती है अतः उसकी आज्ञाओं का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए। राजा की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले दण्ड से नहीं बच सकते थे। विशेष अवसरों पर नागरिक उन्हें उपहार भेंट करते थे। राजा बड़ी शान-शौकत के साथ रहता था। वह मूल्यवान वस्त्र और स्वर्णाभूषण धारण करता था। किन्तु ऋग्वेद के साक्ष्य के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह पूर्णतः निरंकुश शासक नहीं होता था । “सभा” और “समिति” नाम की दो संस्थाएँ उसकी निरंकुशता पर सामान्यतः अंकुश लगाती रही होंगी।

| (7) राज्याधिकारी - 

राजा शासन को सन्तोषजनक रूप से चलाने के लिए कुछ मन्त्रियों और अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। राजा की सहायता के लिए रखे गये अधिकारियों में से दो प्रमुख थे - एक पुरोहित, दूसरा सेनानी । पुरोहित का राज्य में एक सम्मानजनक स्थान था । वह राजा का दाहिना हाथ माना जाता था। वह प्रशासनिक मामलों में, धार्मिक कृत्यों में और राष्ट्र पर आये संकट की स्थिति में राजा को उचित परामर्श देता था। |शत्रु से युद्ध करने पर वह विजय के लिए प्रार्थना और अनुष्ठान करता था। पुरोहित राजघराने
के अभिन्न अंग होते थे। उन्हें राजाओं की ओर से मूल्यवान पुरस्कार, दान, दक्षिणा मिलती रहती थी । सेनानी युद्ध में सैन्य संचालन करता था। ये दोनों अधिकारी सम्भवतः राजा द्वारा ही नियुक्त होते थे । ग्रामणी, सभ्य, समाचार वाहक एवं गुप्तचर आदि अन्य अधिकारी थे जो शासन प्रबन्ध को सुचारु रूप से चलाने में राजा की सहायता करते थे। |

(8) सभा एवं समिति - 

आर्यकालीन राजनैतिक संगठन में सभा और समिति, नाम की दो महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ थीं । समिति एक प्रकार की जन सभा (General Assembly) थी जिस में “टिस्” या प्रजा भाग लेती थी । यह सभा साधारण तौर पर अत्यावश्यक समस्याओं के उपस्थित होने पर ही बुलाई जाती थी। युद्ध सन्धि अथवा राजा के चुनाव जैसे गम्भीर विषयों पर इसमें प्रजा का मत लिया जाता था। सभा, सम्भवतः आर्यों की एक विशेष संस्था थी जिसमें ब्राह्मण और धनाढ्यों का प्रतिनिधित्व होता था। सभा और “समिति” की कार्य-विधि के बारे में ऋग्वेद से विशेष जानकारी नहीं मिलती । इतना अवश्य ज्ञात होता है। कि समिति की बैठक में राजा प्रधान का आसन ग्रहण करता है। बहुत से इतिहासकारों का अनुमान है कि सभा और समिति एक ही संस्था थी। कुछ विद्वान इन्हें अलग अलग मानते हैं। वस्तुस्थिति कुछ भी रही हो। इन संस्थाओं की विद्यमानता कम से कम इस बात को पुष्ट करती है कि राजा के अधिकार असीमित नहीं थे और राज्य के महत्त्वपूर्ण मसलों पर उसे जाति के सभी लोगों से परामर्श लेना पड़ता था। सभा और समिति कभी कभी बड़े गम्भीर मामलों पर अपना निर्णय देती थी राजा के दुराचारी, अत्याचारी और व्यभिचारी होने पर ये उसे राजा के पद से हटा सकती थी।

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