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प्रश्न 9 मध्यपाषाणकालीन भारतीय संस्कृति पर टिप्पणी लिखिए।

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उत्तर मध्यपाषाणकालीन भारतीय संस्कृति

उच्च पुरापाषाण युग का अन्त, हिमयुग के अन्त के साथ-साथ 8000 ई.पू. के आस-पास हुआ और जलवायु उष्ण एवं शुष्क हो गई। जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए और मानव के लिए नवीन क्षेत्रों में आगे प्रगति करना सम्भव हुआ। विद्वानों की राय है कि उसके उपरान्त जलवायु की परिस्थितियों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।
पाषाणयुगीन संस्कृति में 8000 ई.पू. से एक मध्यकालीन अवस्था का प्रारम्भ हुआ जिसको मध्य पाषाण युग कहते हैं। यह पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग के मध्य का संक्रान्ति काल है। भारत में इस काल का आरम्भ 8000 ई.पू. के आस-पास हुआ और लगभग 4000 ई.पू. तक चला। . इस काल में भारतीय जीवन या संस्कृति की प्रमुख विशेषताएं ये बताई जाती।
(i) मानव द्वारा टोलियाँ बनाना-इस युग में शिकार के लिए भारतीय मानव ने छोटी-छोटी टोलियाँ बनाईं क्योंकि अब तक आते-आते मनुष्य की जनसंख्या बहुत बढ़ चुकी थी तथा उसने सामूहिक रूप से शिकार करना अधिक लाभकारी समझा।
(ii) तीर कमान का विकास-इस युग में मानव ने तीर-कमान का विकास किया जो 15वीं अथवा 16वीं शताब्दी तक एक प्रमुख उपकरण एवं हथियार के रूप में रहा।
(iii) चाक बनाना-इसी काल में तीर के लिए चाकू जैसे तेज प्रस्तर उपकरण । बनाए गए थे जो तीर-कमान बनाने के साथ-साथ अन्य घरेलू कार्यों के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए।
(iv) उपकरण बनाना-इस काल में तीर-कमान तथा पाषाण के चाकू के। साथ-साथ कुछ अन्य उपकरण भी प्रयोग में लाये गये जिनमें प्रमुख थे--इकधार फलक (Backed Blade), बेधनी चन्द्राकार (Lunate), समलम्ब (Trapeze) आदि। इस । काल के विशिष्ट उपकरण लघु पाषाण (Microliths) है।

उच्च पुरापाषाण युग का अन्त

(v) संस्कृति के स्थल-जहाँ तक इस संस्कृति के स्थलों का सम्बन्ध है उनमें । प्रमुख हैं-पश्चिमी बंगाल में वीर मानपुर, गुजरात में लंघनज और तमिलनाडु में टेरी । समूह । इस काल से सम्बन्धित कुछ स्थल मध्य भारत, छोटा नागपुर तथा कृष्णा नदी । के दक्षिणी भाग में भी प्राप्त हुए हैं।
(vi) फर्श बनाना-इस काल के अन्तिम वर्षों में मानव ने अपने निवास स्थलों । पर फर्श बनाने के लिए पत्थर लगाए और फैंस से हवा रोकने के लिए पर्दे भी बनाए ।
आजकल भी राजस्थान के कुछ गाँवों में इस तरह के पर्दे भूसा आदि को हवा से उड़ने । न देने के लिए बनाये जाते हैं।
(vii) छोटी-छोटी वस्तुएं बनाना-इस काल में विभिन्न आकार वाली अनेक तरह । की छोटी-छोटी वस्तुएं बनाई गईं और उन्हें ज्यामितीय प्रारूप की दृष्टि से बड़ा उत्तम् । माना जाता है।
(viii) इसी काल से (सम्भवतः कालान्तर में) सम्बन्धित ऐसे नर-कंकाल प्राप्त हुए हैं जिनको देखकर यह अन्दाजा लगाया गया है कि अब मृत् मानव के शव को । सुनियोजित ढंग से दफन किया जाने लगा था। गंगाद्रोणी में ऐसे दो स्थल प्राप्त हुए । हैं—प्रतापगढ़ जिले में सराय नाहर नराय और महादाहा।।
(ix) आवास के लिए झोपड़ियाँ बनाना-सराय नाहर राय और महादाहा नामक । दोनों स्थलों से स्तम्भगर्त (अर्थात् रहने के फर्श पर ऐसे गर्त या गड्डे जिनमें स्तम्भ गाड़े। गए होंगे और उन पर छत बनाई गई होगी) मिले हैं जिससे अनुमान लगाया गया है। कि इस काल में आवास के लिए झोपड़ियाँ बनाई गयी होंगी।

(x) पत्थर से आक्रमण-

इसी काल में मानव ने दूसरे मानव पर पत्थरों से । आक्रमण करना भी शुरू किया क्योंकि सराय नाहर राय से एक शव कंकाल की सिर । की अस्थि में एक सूक्ष्म पाषाण जड़ा हुआ मिलता है।
(xi) गुफा चित्रकारी-मध्यपाषाण युग में भारतीय मानव ने गुफा-चित्रकारी भी । करना शुरू कर दी थी। विंध्याचल के शैलाश्रयों और गुफाओं में अनेक ऐसे । प्रागैतिहासिक चित्र मिले हैं। इन चित्रों में प्रायः ज्यादातर चित्र शिकार, नृत्य और युद्ध । की गतिविधियों से सम्बन्धित हैं।
(xii) पालतू पशु-सम्भवतः इस काल के समाप्त होने से पूर्व ही भारतीय मानव । ने पशुओं को पालतू भी बनाना शुरू कर दिया था।
(xiii) अन्य विद्वानों की राय है कि इस काल का भारतीय मानव शिकार कन्द-मूल और फलों को इकट्ठा करना, मछली पकड़ना तथा कालान्तर में पशुओं के पालने जैसे व्यवसाय करता था। उसने औजारों को बनाने के साथ-साथ औजारों के निर्माण में सहायक उपकरण भी तैयार करने शुरू कर दिये थे। सम्भवतः मनकों के बने आभूषण भी उसने पहनने शुरू कर दिये थे।

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