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वर्ण व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 

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(9) न्याय व्यवस्था - 

न्याय का प्रमुख स्रोत राजा था। उसका निर्णय अन्तिम निर्णय माना जाता था। यह युग विकसित न्याय प्रणाली का युग नहीं था । आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ
ऋग्वेद” न्याय व्यवस्था पर उचित प्रकाश नहीं डालतां । सम्भवत: उस समय किसी प्रकार की विधि संहिता की रचना नहीं हुई थी और न्याय की प्रकृति और परिणाम बहुत कुछ न्यायकर्ता। की तत्कालीन मनोदशा पर निर्भर रहता था। उल्लेखित संकेतों से यह ज्ञात होता है कि दण्ड व्यवस्था अति कठोर नहीं थी। सामान्य व्यक्ति के हत्यारे को मृतक के उत्तराधिकारी को सौ गायें दण्ड स्वरूप देनी पड़ती थीं। इस दण्ड की व्यवस्था आनुपातिक थी । उदाहरणतः ब्राह्मण के हत्यारे पर 100 गायों का जुर्माना किया जाता था तो शूद्र की हत्या पर केवल 50 का । इसके अतिरिक्त बन्दीगृह भी थे जिनमें अपराधियों को सजा भुगतनी पड़ती थी। अपराध को प्रमाणित करने के लिये अग्नि- परीक्षा और जल-परीक्षा का भी प्रचलन था । चोरियाँ अधिकतर पशु-धन की होती थी । पंच फैसले का भी ऋग्वेद में उल्लेख हुआ है।

| (10) युद्ध प्रणली - 

आर्यों में युद्ध असाधारण घटना नहीं थी भारत के आदिवासियों से उनके निरन्तर युद्ध होते रहे तथा कभी कभी आर्यों के एक समूह से ही आर्यों के दूसरे समूह की भिड़न्त हो जाती थी । ऋग्वेद में दस्युओं और आर्यों के युद्ध का अनेक स्थलों पर उल्लेख है । आर्य लोग दस्युओं को घृणा की दृष्टि से देखते थे। ऋग्वेद में इन्द्र को देवों में अग्रणी माना गया है। युद्ध से पूर्व विजय प्राप्ति के लिए उसका आह्वान आवश्यक समझा जाता था।
आर्यों की सेना मुख्यतः दो प्रकार की थी- पैदल और रथारूढ़ । सामान्य योद्धा पैदल युद्ध करते थे और दल के विशिष्ट अधिकारी रथों से तीर चलाते थे । धनुष, बाण, बछ और एक प्रकार के तलवार जैसे अस्त्रों का युद्ध में प्रयोग होता था । धनुर्विद्या पर अधिक बल दिया जाता था। रथ में घोड़े जुड़ते थे और सारथी अधिकतर खड़ा होकर ही रथ चलाता था । धनुर्धारी के लिए रथ में बैठने का स्थान रहता था। रथ सम्भवतः चमड़े और लकड़ी के बनते थे।

उत्तर वैदिक कालीन राजनैतिक व्यवस्था

पूर्व वैदिक काल में राजनैतिक व्यवस्था का शैशव काल था। उत्तर-वैदिक काल में राजनैतिक संगठन अधिक विकसित हो गया । ऋगवेदीय काल में विकसित राजनीतिक स्थिति के मुख्य बिन्दु निम्न हैं -

(1) राजा की शक्ति में वृद्धि - 

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का सामान्य विस्तार प्रायः समस्त उत्तरी भारत पर हो गया था। ऋग्वैदिक काल में राजा के अधिकार सीमित थे क्योंकि उस समय छोटे-छोटे राज्य अस्तित्व में थे । उत्तर वैदिक काल में बड़े-बड़े साम्राज्यों का निर्माण हो गया था । छोटे छोटे राजा, महाराजाधिराज या सार्वभौमिक सम्राट बनने की कामना करते थे। उसी काल में राजतन्त्र और सामन्ती शासन की नींव पड़ी। सत्ता के प्रदर्शन के लिए बड़े-बड़े राजा राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ करते थे। सामान्य जन राजा को “शुल्क” अथवा कर देने लगे थे।

(2) संघ शासन का विकास - 

आर्यों का प्रभुत्व क्षेत्र पर्याप्त रूप से व्यापक हो गया और उनके राजाओं ने विस्तृत साम्राज्य का निर्माण कर राजाधिराज और “एकराट” की पदवियों से स्वयं को विभूषित किया किन्तु तत्कालीन यातायात की असुविधाओं के कारण उन्हें विशाल साम्राज्यों को छोटे राज्य बनाने पड़े और उन्हें अधीनस्थ राजाओं को सौंप देना पड़ा। अर्थात मण्डलेश्वर सम्राटों के अधीन छोटे-छोटे राजा भी अनेक भू-खण्डों पर राज्य करने लगे।

(3) राजा का पद- 

यह सही है कि लोग राजाओं में देवी गुणों की कल्पना करते थे Fन्तु फिर भी राजा के अधिकारों पर जन सत्ता का नियंत्रण था। राजा का पद वंशानुगत था, किन्तु जनता अत्याचारी शासक को सिंहासनच्युत भी कभी-कभी कर देती थी। राजा का राज्याभिषेक बड़े ठाठ-बाट से किया जाता था । उस पर अनेक दायित्व भी लाद दिये जाते थे। उसे शपथ दिलाई जाती थी कि वह जन-कल्याण के लिये अपना जीवन अर्पित करेगा और निष्ठापूर्वक सामान्य जन की सेवा करता रहेगा। प्रशासन में पुरोहित का प्रभुत्व सर्वव्यापी था क्योंकि शासन धर्माधारित था।

| (4) सभा एवं समिति - 

ऋग्वेद कालीन परम्परानुसार राजा की सहायता के लिए सभा और समिति बदस्तूर काम करती रहीं। ये राजा को महत्त्वपूर्ण मसलों पर सत्परामर्श देकर उसकी निरंकुशता को नियंत्रण में रखती थी। यदि सभा और समिति किसी मामले में अपना अन्तम निर्णय दे देती थी तो राजा को उसका निर्णय स्वीकार करना पड़ता था। समिति सर्वसाधारण का प्रतिनिधित्व करती थी और इसके सदस्यों की संख्या भी अधिक थी। सभा उच्च कुल, सभ्रांत पुरुषों, धनाढ्यों और वयोवृद्धों का प्रतिनिधित्व करती और आकार में यह छोटी थी । अथर्ववेद में एक राजा ईश्वर से प्रार्थना करता है “समिति और सभा की अनुकम्पा मुझ पर बनी रहे। इससे स्पष्ट है कि इस काल में सभा और समिति शक्तिशाली संस्थाएँ थी । समिति का अधिवेशन महत्त्वपूर्ण अवसरों पर ही बुलाया जाता था। युद्ध, संधि, प्राकृतिक संकट अथवा आय व्यय के मामलों को तय करने के लिए ही समिति की आवश्यकता पड़ती थी।

(5) अधिकारी वर्ग - 

अथर्ववेद में “रलिका” शब्द का उल्लेख हुआ जो इस बात का द्योतक है कि प्रशासन में राजा की सहायता करने के लिए अनेक मन्त्रियों और अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। “रनिक” के अतिरिक्त “वीर” नामक उच्चाधिकारी और थे जिनकी संख्या 8 थी। उच्चाधिकारियों में राजा का पुत्र, राजा का भाई और उसकी पटरानी। प्रमुख स्थान रखते थे। सूत, क्षत्रप और संग्रहीत भी महत्वपूर्ण अधिकारी थी।

| (6) शासन प्रबन्ध - 

आर्यों की उत्तर वैदिक कालीन राजनैतिक व्यवस्था का मुख्याधार राजतन्त्र था क्योंकि प्रशासन तथा न्याय विभागों को संभालने वाला शीर्षस्थ व्यक्ति राजा ही होता था किन्तु बीज रूप में उसमें लोकतन्त्रात्मक विचारों का प्रादुर्भाव हो चुका था। वैदिक ग्रन्थों में कहीं-कहीं गणतन्त्र के भी उदाहरण मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ प्रान्तों में गणतन्त्र व्यवस्था भी थी।
राजा अपने मन्त्रियों और उच्चाधिकारियों की सहायता से शासन करता था। प्रजा की आतताइयों से रक्षा करना, धर्म और न्याय की व्यवस्था बनाये रखना उसके मुख्य दायि में से थे । वैदिक साहित्य में पुरोहित, वीर, रत्निक, संग्रहीत्रि, कोषाध्यक्ष, सूत, क्षत्रिय, अन्तः पर प्रबन्धकर्ता, अश्वय, गोविकर्तन, सेनानी, ग्रामणी आदि अनेक अधिकारियों का उल्लेख हुआ है। प्रशासन के मुख्य मुख्य विभागों के लिए भिन्न भिन्न अधिकारी होते थे। गाँवों की शासन व्यवस्था ग्राम्य-सभा करती थी । ग्राम्य वादिन की अध्यक्षता में ग्राम्य सभा न्यायिक मामलों में निर्णय देती थी । न्याय का सर्वोच्च स्रोत राजा होता था और प्रायः सभी गम्भीर मामले राजा के सामने न्याय के लिए जाते थे।

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