प्रश्न 38. सातवाहनों के उद्भव और मूल स्थान की विवेचना कीजिए। वाशिष्ठीपुत्र पुलूमावी के राज्यकाल तक उनका संक्षिप्त इतिहास लिखिये।।


सातवाहनों के उद्भव और मूल स्थान की विवेचना कीजिए। वाशिष्ठीपुत्र पुलूमावी के राज्यकाल तक उनका संक्षिप्त इतिहास लिखिये।।


इसके साम्राज्य में महाराष्ट्र, कोंकण और मालवा प्रदेश शामिल थे। वह सातवाहन वंश का ऐसा पहला पराक्रमी शासक था जिसने विन्ध्य प्रदेश में सार्वभौम सत्ता की स्थापना की इसी, के काल में गोदावरी घाटी में प्रथम महल साम्राज्य का उदय हुआ। इसके साम्राज्य का विस्तार एवं शक्ति इतनी बढ़ी जिसके कारण शुंग साम्राज्य व पंचनन्द के पवन राज्य को काफी पीछे छोड़ दिया। इस प्रतापी सम्राट ने केवल 9 वर्ष शासन किया। इस अल्पावधि में उसके काल में व्यापार में काफी उन्नति हुई । उपलब्ध तथ्यों के अनुसार कल्याण व्यापार का मुख्य केन्द्र था। शतकर्णि ने सिरीसात या ‘सातकर्णि' के नाम से मुद्रा प्रसारित की।

गौतमी पुत्र शतकर्णि-

शतकर्णि प्रथम के पश्चात् से सातवाहनों का इतिहास काफी समय तक अन्धकारमय रहा । लगभग 106 ई. पू. में गौतमी पुत्र शतकणि सातवाहन वंश के महानतम् सम्राटों में से एक था। जिसके नेतृत्व में आन्ध्रों अथवा सातवाहनों ने अपनी खोई हुई शक्ति और सत्ता फिर से प्राप्त की यह सातवाहन ब्राह्मण कुल का 23 वाँ राजा था। यह एक विख्यात पराक्रमी राजा हुआ है। उसके शासनकाल की घटनाओं का उल्लेख सात वंश के नासिक में प्राप्त अभिलेख में हुआ है यह अभिलेख गौतमी पुत्र की माता ने उत्कीर्ण कराया था। नासिक अभिलेख में उसे क्षत्रियों का नाम मर्दन करने वाला कहा गया है। इस अभिलेख में विस्तार से उसकी विजयों उसके व्यक्तित्व तथा उसके कार्य- कलापों पर प्रकाश डाला गया है। | 

नासिक अभिलेख से विदित होता है कि उसने यवनों का डटकर मान मर्दन किया। पूर्णवत शासकों के हाथ से शकों ने जिन-जिन प्रदेशों को छीन लिया था उनसे उसने युद्ध । करके पुन: अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने किन-किन राजाओं और क्षत्रियों को हराया। इसका विवरण उपलब्ध नहीं है किन्तु जिन-जिन देशों के साथ उसका युद्ध हुआ जिन प्रान्तों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया उनका अनुमान लगाया जा चुका है। उसके साम्राज्य में पूर्वी ओर पश्चिमी मालवा नर्मदा नदी की घाटी, विदर्भ, उत्तरी महाराष्ट्र, उत्तरी कोंकण, पश्चिमी राजपूताना, महाराष्ट्र, सावरमती का प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश शामिल थे । विन्ध्याचल पर्वत, सतपुड़ा, अरावली पर्वत, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट पर्वत मालाएँ उसके राज्य में थी।

गौतमी पुत्र शतकर्णि का नेहपान के साथ युद्ध-

शतकर्णि के शासन काल की प्रमुख घटना क्षहरात वंश के राजस्थान में पुष्कर तक विस्तृत था। नेहपान के साथ 2 वर्ष तक उसका संघर्ष चला। उसके परास्त करने के लिए शतकर्णि को विशेष श्रम करना पड़ा और अन्ततः नेहपान कूटनीतिक तरीके से ही परास्त किया जा सका । क्षहरात वंशीय इस सम्राट की पराजय से शतकर्णि का आधिपत्य नासिक, पूना, गुजरात, सौराष्ट्र आदि प्रदेशों पर हो गया । नेहपान प्रचलित सिक्कों पर शतकर्णि ने अपनी मौहर लगाकर उन्हें प्रचलित किया। । डॉ. राजबली पाण्डेय ने गौतमी पुत्र शतकर्णि की दिग्विजय और विदेशियों से विशेष संघर्ष का इस प्राकर उल्लेख किया है

गौतमी पुत्र ने एक विशाल सेना लेकर सम्पूर्ण दक्षिण पथ और मध्य भारत को दिग्विजय किया। उसके वाहनों ने तीन समुद्रों (पूर्वी सागर, पश्चिमी सागर और दक्षिण में हिन्द महासागर का जल दिया ।) - उसका राज्य ऋषिक (गोदावरी और कृष्ण्य के बीच का प्रदेश) अरमक (गोदावरी का तटवर्ती प्रान्त) “मूलक' (पैठन के आस-पास का उत्तरी भाग) अनूप (निमांड जिला) विदर्भ (बरार) पूर्वी मालवा, अवन्ति के ऊपर विस्तृत था। सभी राजाओं ने उसके शासन को स्वीकार किया।” इस वर्णन से विदित होता है कि गौतमी पुत्र ने सुदूर दक्षिण के राज्यों अवन्ति, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र के शक राज्यों और मध्य भारत तथा राजस्थान के गणराज्यों के ऊपर अपना आधिपत्य किया। इन राज्यों में बहुत से क्षत्रिय राज्य भी थे। इसीलिए गौतमी पुत्र शतकर्णि को क्षत्रियों के दर्प और मान का मर्दन करने वाला कहा गया है।

गौतमी पुत्र शतकर्णि का शासन प्रबंध- 

गौतकी पुत्र शतकर्णि एक महान् विजेता ही नहीं एक आदर्श शासक भी था। वह प्रजा के दुःख-सुख मे सहभागी था। वह प्रजा के हर व्यक्ति के दुःख-सुख को अपना ही दु:ख-सुख मानता था। वह सभी परिवार जनों के यश में वृद्धि करने वाला था। उसके शासनकाल में प्रजा प्रसन्न थी उसने अपनी प्रजा पर अधिक कर नहीं लगाये एवं अपराधियों के साथ अधिक कठोरता न बरतते हुए सुधारात्मक उपायों का आश्रय लिया। उत्कीर्ण लेखों और पुराणों से गौतमी पुत्र की शासन पद्धति का सन्तोषजनक विवरण नहीं मिलता । याज्ञवल्क्य स्मृति इसी काल में लिखी गई थी अतः आन्ध्र सातवाहन शासन पद्धति की इस पर पूरी छाप है। इससे विदित होता है कि राज्य का केन्द्रीय शासन सुदृढ़ था और न्याय व्यवस्था बहुत अच्छी तरह से संगठित थी।

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