Discuss the Various theories regarding the date of Kanishaka I


Discuss the Various theories regarding the date of Kanishaka I

अथवा प्रथम कनिष्क की तिथि निर्धारित कीजिए तथा भारतीय इतिहास में उसे राज्यकाल के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
Discuss the date of Kanishaka I and evaluate the importance of his reign in the history of India.

डॉ. राय चौधरी दुब्रोआ के इस कथन पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि स्टेनकोनोव ने यह भी दिखलाया है कि कनिष्क सम्वत् के सभी अभिलेखों की तिथि एक ही नियम के अनुसार नहीं दी हुई है। कनिष्क एवं उसके उत्तराधिकारी खरोष्टी अभिलेखों में उसी प्रकार तिथियों का उल्लेख करते है जिस तरह उनके पूर्वाधिकारी शक पल्हों ने किया है वह महीने का नाम व महीने का कौनसा दिन है इस नियम के अनुसार बतलाते हैं। दूसरी तरफ कुयने ब्राह्मी लेखों में कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों ने तिथि गणना की प्राचीन भारतीय पद्वति का ही पालन किया है। अब प्रश्न उठता है कि क्या इस बात से हम इस सार पर पहुंच सकते हैं कि कनिष्क सम्वत् की खरोष्टी तिथियों का वर्णन उस सम्वत् की तिथियों के साथ नहीं किया जा सकता । जिसमें ब्राह्मी अभिलेख उत्कीर्ण किये गये हैं।

कनिष्क ने यदि तिथिक्रम की दो विभिन्न प्रणालियों को अपनाया था तो इस बात को मानने में हमें किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए कि कनिष्क ने पश्चिमी भारत की स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल एक तीसरी प्रणाली भी अपना ली होगी। स्टेनकोनोव ने भी स्वयं यह स्वीकार किया है कि शक तिथियों के महीने का एवं यक्ष का नाम दिया हुआ है यही बात खरोष्ठी लेखों के बारे में भी कही जा सकती है। उस बात में कोई सम्भावना नहीं है कि जिस तरह कनिष्क ने सीमावर्ती प्रदेश में प्राचीन शक, पल्हवों की प्रणाली को स्वीकार किया और भारत में तिथिक्रम की प्राचीन पद्वति को जिनका कि यहाँ पर प्रचलन या अपना लिया उसी प्रकार उसके द्वारा नियुक्त अधिकारियों ने पक्ष को जोड़ दिया जिससे देश के उस भाग में प्रचलित प्रथा के अनुसार यह प्रणाली मेल खा सके।

Kanishaka I and evaluate the importance


इस उल्लेख के अनुसार कनिष्क सम्वत् का समीकरण शक काल के साथ किया जा सकता है। डॉ. दिनेश चन्द सरकार का कथन है कि “यदि कनिष्क सम्वत् का समीकरण शक काल के साथ स्वीकार कर लिया जाय जिसका कि अनेक विद्वान समर्थन करते है तो कनिष्क ने 78 सन् ई. से लेकर 101 या 102 ई. तक शासन किया।” कनिष्क की तिथि के सम्बंध में 78 ई. सन् वाले मत का समर्थन करते हुए प्रो. एन. एन. घोष ने लिखा है कि “78 ई. सन् वाली तिथि इसलिए विशेष रूप से सम्भाव्य है कि अन्य कारणों के मध्य यदि कनिष्क शासन का प्रारम्भ हम द्वितीय शती ई. में रखते हैं तो रूद्रदमन की स्वतंत्र सत्ता के लिए जिसने 130 - 150 ई. में शासन किया आधार नहीं मिलता ।

रूद्रदमन की स्वतंत्र राजसत्ता का जिसका -ि वस्तार सिन्धु घाटी के निम्न प्रदेश को लेकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत में था । कनिष्क के भारतीय साम्राज्य विस्तार के साथ किसी प्रकार का सामंजस्य नहीं स्थापित हो पाता यह केवल उसी दशा में सम्भव है जब कि यह मान लिया जाय कि कनिष्क की मृत्यु के उपरान्त एवं उसके उत्तराधिकारियों के कमजोर शासन काल में पश्चिमी क्षत्रप में अपनी खोई स्वाधीनता प्राप्त कर ली हो उन्होंने कनिष्क प्रथम के नेतृत्व में कुषाणों की बढ़ी हुई लहर के आगे खो दी थी।” । हालांकि कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को लेकर काफी विवाद रहा है। परन्तु डॉ. रमा शंकर त्रिपाठी, डॉ. घोष के विचारों का समर्थन करते हुए लिखते है कि “इस अनन्त वाद-विवाद के बावजूद हमें कनिष्क द्वारा 78 ई. के शक सम्वत् का संचालन सही जान पड़ता है।

कनिष्क की तिथि

इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने एक सम्वत् चलाया था क्योंकि उनकी गणना पद्धति उसके उत्तराधिकारियों द्वारा भी प्रयुक्त हुई और उत्तर भारत में प्रचलित हम किसी अन्य संवत् को नहीं जानते जिसका आरम्भ उस दूसरी शती ई. के प्रथम चरण में हुआ था जो तिथि कनिष्क के राज्यारोहण के सम्बंध में दी जाती है। उसके अतिरिक्त यदि प्रथम शती ई. के तृतीय चरण के मध्य में कुजुल कदफिस मरा तब तक कनिष्क उस तिथि से बहुत दूर नहीं हो सकता क्योंकि 80 वर्ष तक जीवित रहने के कारण विम कदफिस का राज्य काल थोड़े समय ही रहा होगा।” | डॉ. पी. एल. भार्गव का मत- कनिष्क के राज्यारोहण तिथि के विषय में अभी तक विवाद बना हुआ है। विभिन्न इतिहासकारों ने इसकी तिथिक्रम के बारे में अपनी पृथक-पृथक राय व्यक्त की है। पहली शताब्दी ई. पू. से तीसरी शती तक कनिष्क की अनेक राज्यारोहण की तिथियाँ बताई है।

लेकिन प्राप्त सिक्कों के आधार पर यह विदित होता है कि कनिष्क विम कदफिस के पश्चात् हुआ तथा कदफिस एवं कनिष्क के समय में ज्यादा अन्तर नहीं है। परन्तु वर्तमान प्रायः समस्त इतिहासकारों की यह राय बनी है कि कनिष्क या तो प्रथम शती के उत्तरार्द्ध में या द्वितीय शती के पूर्वाद्ध में हुआ । सभी की राय के अनुसार कनिष्क ने एक सम्वत् चलाया यह तो तय है कि उसके उत्तराधिकारियों ने उसके द्वारा प्रारम्भ की हुई गणना को जारी रखा। भारत में ऐसा कोई सम्वत् नहीं है जो दूसरी शती के पूवार्द्ध में प्रारम्भ हुआ। हो लेकिन प्रथम शती के उत्तरार्द्ध में 78 ई. में ही मानना युक्तिसंगत जान पड़ता है।

भारतीय इतिहास में कनिष्क के राज्यकाल के महत्व

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि के विषय में विवाद रहते हुए भी अधिकतर इतिहासकारों का सर्वसम्मत मत यही है कि कनिष्क ने शक सम्वत् की स्थापना की जो 78 ई. में आरम्भ हुआ । कनिष्क भी 78 ई. में सम्राट बना और इसी तिथि को सभी विद्वान् उचित मानते हैं।
विभिन्न मतों की समीक्षा- डॉ. घोष ने लिखा है कि विभिन्न इतिहासकरों ने कनिष्क की राज्यारोहण के सम्बंध में जो मत दिये है। इन विभिन्न मत-मतान्तरों की समीक्षा से निम्न शर्ते अपने आप स्पष्ट हो जाती है -

(1) कनिष्क की प्रथम शताब्दी ई. पू. में अथवा इसके पूर्व रखा नहीं जा सकता वयोंकि वह कदफिसीज सम्राटों के पश्चात् हुआ और कदफिसीज सम्राटों का अभ्युदय 45 ई. * पल्हव शासक गोण्डोफर्नीज के पतन के पश्चात् ही हुआ होगा।

| (2) कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि दूसरी या तीसरी शती ई. में यह तिथि इसके बाद नहीं रखी जा सकती क्योंकि इससे क्रमश: रूद्रदमन एवं गुप्तों के. उत्कर्ष के साक्ष्य मेल नहीं खाते ।।

(3) कनिष्क ने एक सम्वत् की स्थापना की जिसे यदि किसी परम्परागत सम्वत् के साथ जोड़ा जाय तो बहुत अच्छा है।

उपरोक्त विवेचन के पश्चात् अब केवल ईसा की प्रथम शती ही बचती है जिसमें कनिष्क को रखा जा सकता है सौभाग्य से पहली शती में एक सम्वत् के प्रचलन की परम्परा, भी है जिसे शक सम्वत् कहा जाता है। और जिसकी आरम्भिक तिथि 78 ई. है । अतः कनिष्क को शक सम्वत् का प्रवर्तक मानना ही अधिक उपर्युक्त होगा।

No comments:

Post a Comment