फिल्मी दुनिया में महिलाओं का योगदान


भारतीय सिनेमा में यं भी महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता पर बात जब निर्देशन की हो तो कहना ही पड़ेगा कि वे यहां भी किसी से कम नहीं हैं। महिला फिल्म निर्देशकों की पूरी पीढ़ी ने एक खास पहचान बनाई है।

भारत की महिला फिल्मकारों के इतिहास पर अगर नजर डालें तो हम पाते हैं कि पहली फिल्मकार 'फातिमा बेगम' थीं जिन्होंने 1926 से 1929 तक लगातार फीचर फिल्में बनाई।

इसके बाद 1946 में बंगाल की प्रतिमा शाश्मल ने 'निवेदिता' नामक फिल्म बनाई। तत्पश्चात प्रमिला दास गुप्ता ने 'झरना' व 'झमिया' नामक फिल्मों का निर्माण किया। फिल्मकार तपन सिन्हा की पत्नी अरुंधती देवी ने भी 1967 से 1985 तक कई बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया। इसी दौर में मलयाली अभिनेत्री मध ने भी अपनी मातृभाषा में लगातार बीस वर्षों तक फिल्म निर्देशन किया। सई परांजपे, अपर्णा सेन, गोपी देसाई, विजय मेहता, मीरा नायर, अरुणा देसाई, दीपा मेहता जैसे महिलाओं की फिल्मों ने तहलका मचाया है। सिमी ग्रेवाल की 'रुखसत' और हेमा मालिनी की 'दिल आशना है' में स्त्री मन की संवेदनशीलता साफ नजर आती है।

अपर्णा सेन

महिला फिल्मकारों में सशक्त हस्ताक्षर अपर्णा सेन के बहआयामी व्यक्तित्व ने उन्हें उनके कार्यक्षेत्र में परी तरह कामयाबी दिलाई। अपर्णा सेन का जन्म उनकी नानी के घर पाणिडत्य प्लेस में हआ। वह घर जो आज भी उनकी स्मृतियों में रचा बसा है, जहां बरसात का पानी एकत्र हो जाता था और गली के बच्चों के साथ वह छपछपाते पानी में क दती थीं।

अपर्णा की जिंदगी में उनके माता-पिता का खासा प्रभाव रहा है। चंकि शुरू से ही उन्हें घर में ऐसा माहौल मिला था कि मृणाल सेन, सौमित्र चटर्जी, कमल मजमदार जैसे बड़े लेखकों का उनके घर आना जाना रहता था। वे लोग उन्हें प्रोत्साहित करते । बचपन से ही अपर्णा को शास्त्रीय संगीत से बेहद लगाव रहा है। किशोरावस्था तक वे बेहद शर्मीली और संकोची थीं। कभी-कभी तो अत्यंत अके लापन भी महसस करतीं। बाद में उन्होंने महसस किया कि इस तरह वह सबसे अलग होती चली जाएंगी। फिर धीरे-धीरे उनके अंदर आत्मविश्वास आने लगा। उन्होंने डेली डायरी लिखना शुरू किया।

इसी दौरान अभिनय से जड़ी और क छ फिल्मों में भमिकाएं भी करने लगीं। सत्यजित रे की तीन फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया। मृणाल सेन के साथ काम करना तो उनके लिए यादगार अनुभव रहा। अपनी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन के अनुभव को लेकर वह कहती हैं, उस दौरान जब मैं फ्रांसिसी कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद पढ़ती तो मुझे लगता कि मैं भी बंगाली में पटकथाएं लिख सकती हूं। अपनी पहली स्कि प्ट को जब मैंने सत्यजित रे को पढ़ने के लिए दी तो उन्हें बेहद पसंद आई। और जब फिल्म बनाने का समय आया तो यह फिल्म मेरे ही निर्देशन में बनीं। अपर्णा सेन की 36 चौरंगी लेन और पैरोमा में उन्होंने अचेतन मन और सपनों को लेकर क छ प्रयोग किए। खास बात यह थी कि 'परोमा' की शक्ति को बताने के लिए अपर्णा सेन ने प्रतीक के रूप में एक पौधे का उपयोग किया जो कि मजबती के साथ ही कोमलता का भी प्रतीक रहा। 'परोमा' में महिलावादी सहान भति होना कहानी की मांग है।

सई परांजपे

बाल जगत और नाटक के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है सई परांजपे जिन्होंने 1974 में बच्चों के लिए 'जादू का शंख' और 'सिकंदर' नामक बाल फिल्में बनाई । मराठी भाषा की लेखिका तथा नाट्य निर्देशिका के रूप में जानी जाने वाली सई परांजपे ने 'स्पर्श', 'चश्मे बद्दर', 'कथा' आदि जैसी फिल्में बनाकर फिल्म जगत में अपनी खास पहचान बनाई। इनकी पहली फिल्म स्पर्श को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। सई परांजपे ने नाटक, दूरदर्शन व रेडियो लेखन आदि भी किया है। सबसे पहले इन्होंने दूरदर्शन के लिए 1972 में एक लघु फिल्म 'द लिटिल टी शॉप' बनाई। इसके बाद बेगार, सिकंदर, के प्टन लक्ष्मी, फ्रीडम फायर जैसी लघु फिल्मों का निर्माण किया। सई परांजपे ने अंधों की व्यथा पर आधारित एक फीचर फिल्म बनाई।

दीपा मेहता

जानी-मानी महिला फिल्म निर्देशक दीपा मेहता पिछले क छ वर्षों से लगातर चर्चा में हैं। उनकी फिल्म 'फायर' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता हासिल हई। खद को आधी कनेडियन और आधी भारतीय मानने वाली दीपा मेहता ने दिल्ली विश्वविालय से फिलोसफी की पढ़ाई करने के बाद कै रियर में स्क्रिप्ट राइटिंग और बच्चों की फिल्में बनाने की सोची। उन्होंने सबसे पहली फिल्म 'सैम एंड मी' 1991 में बनाई। इसके बाद दूसरी फिल्म 1992 में यंग इंडियन जोंस क्लोरोनिक ल को निर्देशित किया। सबसे बड़ी लोकप्रियता उन्हें फिल्म फायर से ही मिली। यह फिल्म करीब 30 देशों में बिकी। इस फिल्म में उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय परस्कारों से सम्मानित किया गया। दीपा की 'अर्थ' जो कि कोकिंग इंडिया उपन्यास पर आधारित थी, खासी चर्चित रही। 1998 में दिल्ली में शट की गई अर्थ फिल्म को वर्ल्ड प्रीमियम में टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित किया गया। अपनी 'वाटर' फिल्म को लेकर दीपा मेहता अभी भी विवादों के घेरे में हैं। काशी में इसकी शूटिंग पर कई विवाद उठ खड़े हए और इस फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई।

अरुणा राजे

फिल्मकार अरुणा राजे के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। विवाह के बाद उनका जीवन बड़ा संघर्षमय था। पति के साथ वह ज्यादा दिन तक नहीं रह पाई। हालांकि कई वर्षों तक वे कोशिश करती रही कि एडजस्टमेंट होती रहे लेकिन पति उनसे तलाक ले कर दूसरा विवाह करना चाहते थे। फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने चनौतियों का डटकर मुकाबला किया। अरुणा का मानना है कि अगर महिलाएं किसी भी क्षेत्र में ऊंचे स्तर पर काम करती हैं तो समस्याएं तो आती ही हैं । ऐसा भी नहीं कि कामकाज की जगहों पर पुरुष का सपोर्ट नहीं मिलता। दरअसल, पुरुष सहयोगी को यह विश्वास हो जाए कि उनकी महिला सहयोगी काम करने में पूरी तरह सक्षम हैं तो वे उसे जरूर सम्मान देते हैं। मै ने भी जब फिल्म इंडस्ट्री में यह साबित कर दिखाया कि मैं सिर्फ महिला होने का फायदा नहीं उठा रही बल्कि पुरुषों की तरह काम करने की क्षमता मझमें हैं। मैं कभी साड़ी नहीं पहनती, बिंदी नहीं लगाती, आभ षण नहीं पहनती मेरा प्रिय पहनावा जींस और टीशर्ट है।

कल्पना लाजमी

चित्रकार, नाटककार, कवि, लेखकों के बीच पली बढ़ी कल्पना को शुरू से ही ललित कलाओं के विभिन्न रूपों से जड़ने का मौका मिला। लेकिन इन सबसे बीच रहने के बावजद वह अपनी एक अलग ही पहचान बनाना चाहती थीं। कल्पना स्कू ल में थी तभी रंगमंच के प्रति उनकी रुचि जागृत हो गई और इसी क्षेत्र को अपना कै रियर बनाने की सोचने लगीं। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में बी.ए करते हुए उन्होंने सत्यदेव दुबे के साथ काम किया। इसके अलावा गिरीश कनार्ड के नाटक 'हयवदन' में भी जड़ीं। श्याम बेनेगल का मार्गदर्शन उन्हें हमेशा मिलता रहा।

1954 में सारस्वत ब्राहमण परिवार में जन्मी कल्पना को शुरू से ही पर्ण बौद्धिक और कला के प्रति रुचि पैदा करने वाला माहौल मिला। मध्यमवर्गीय माहौल में पली-बढ़ी कल्पना के माता-पिता उनका विवाह करना चाहते मगर वह इसके लिए तैयार नहीं थी। अंततः उन्होंने घर छोड़ दिया और अलग रहने लगीं। इसी बीच उनके जीवन में एक ऐसा व्यक्ति आया जो विवाहित तो था साथ ही उनसे उम्र में काफी बड़ा था। मगर जल्दी ही उनके भावनात्मक रिश्ते टूट गए और कल्पना बरी तरह आहत हई। यह सदमा उनके लिए गहरा था मगर उन्होंने खद को संभाल लिया और परे आत्मविश्वास के साथ कामयाबी के रास्ते पर चल पड़ीं। उनकी फिल्म 'रू दाली' में क छ इसी तरह का दर्द उभरकर आया है। उनका सपना है कि वह अपने प्रोफेशन में वो म काम हासिल करें जिसका सपना वो देख रही हैं।

No comments:

Post a Comment